The Guru of Gurus - Audio Biography
The Guru of Gurus - Audio Biography
सेवा
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उनका वन ट्रैक माइंड था। ट्रैक सेवा था। ज्यादातर लोगों के लिए, सेवा अच्छे कर्म, अच्छे अंक अर्जित करने, कर्ज चुकाने के बारे में है। उन्होंने हमें दिखाया कि सेवा के क्या मायने हैं । अपने अदृश्य रूप या गुण मिश्रन को बदलने के लिए सेवा उच्च लोकों का पासपोर्ट बन गई। गुरुदेव के बैंक में सेवा सबसे अधिक लाभदायक आध्यात्मिक म्युचुअल फंड, जीवन का सबसे बड़ा निवेश था।
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गुरुदेव ऑनलाइन गुरुओं के गुरु - महागुरु की ऑडियो बायोग्राफी प्रस्तुत करता है।
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आध्यात्मिक विकास में सेवा की क्या अहमियत है, इस पर गुरुदेव की राय और उनका नज़रिया समझना बड़ा दिलचस्प है। यह सेवा का तरीक़ा समझने का एक सबक़ है। सेवा हर इंसान की जिंदगी में किस तरह काम करती है, इस पर कुछ खास नज़रिये पेश हैं इस पॉडकास्ट में.
आइए सुनें ...
सेवा
आमतौर पर सेवा का मतलब है अच्छे काम करना। नेक इंसान बनना। गहरे अर्थों में विचार करें तो लोगों के साथ सुख-दुख साझा करने की प्रवृत्ति होना। दूसरों की सेवा करने की प्रवृत्ति से हम अपना भी भला करते हैं। दूसरों की सेवा का निरंतर अभ्यास करने के रवैये से इंसान को प्रकृति के समस्त जीवित रूपों से जुड़ा हुआ देखने में मदद मिलती है।
एक आत्मा से दूसरी आत्मा के बीच के अंतर को सेवा के ज़रिए पाटा जा सकता है। इससे समायी चेतना विस्तृत चेतना बन जाती है, जो खुद ब खुद विकास की ओर ले जाती है।
जंगल या पौधों की दुनिया के साथ पहचान बनाना कभी भी एकांत में खड़े पेड़ के साथ पहचान बनाने की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली होता है। सेवा के माध्यम से व्यक्तिगत चेतना का यही विस्तार गुरुदेव का उद्देश्य था।
मैं एक हूं और मैं सब हूं - के बीच के दायरे की ज़रा कल्पना कीजिए!
खुद की पहचान से जुड़े रहने की प्रवृत्ति ने मोह और स्वार्थी लालसाओं को जन्म दिया। इसके कारण हमारा मन भी सीमित हो गया, और हमारा विकास भी। ब्रह्मांड एक घर में सिकुड़ गया, समुद्र एक गिलास में, और हमने सीमाओं के साथ जीने और सीमित सोचने के लिए अपने आपको तैयार कर लिया।
सेवा ने इन सभी परिस्थितियों को उलटने में मदद की। इसने स्वयं द्वारा स्वयं का सम्मान किया, आत्मा के साथ शरीर का मेल किया जिससे सहयोग और प्रगति के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण हुआ। यह दो अक्षरों का शब्द – सेवा,चारों दिशाओं में परिवर्तन लेकर आया।
गुरुदेव ने सेवा की अवधारणा को बहुत अधिक विकसित किया। उसे गहराई दी। उन्होंने विभिन्न तरीक़ों से सेवा की। आध्यात्मिक उपचार उनमें से सिर्फ़ एक तरीक़ा था। आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों को उन्होंने बरकत दी। उन लोगों को सुरक्षा दी, जिन्हें आत्माओं और अन्य नकारात्मक ऊर्जाओं से ख़तरा था। उन्होंने आध्यात्मिक पथ पर बढ़ने की इच्छा रखने वालों की मदद की। जो लोग अनाज नहीं ख़रीद सकते थे, उन्होंने ऐसे लोगों को राशन दिया।
जो बात उन्हें सबसे अलग बनाती थी, वह यह थी कि उन्होंने लोगों की कुछ नकारात्मकताओं को दूर करके उनका भाग्य बदल दिया। यदि किसी भक्त ने भोजन नहीं किया होता, तो वह अपना भोजन त्याग देते थे। उन्होंने अन्य संतों और देवताओं के साथ अपने संबंधों का इस्तेमाल दूसरों की मदद करने के लिए किया।
मैं उनकी तरह जो काम नहीं कर पाया वह यह था कि वह उन लोगों की भी मदद करते थे, जिन्हें बहुत अच्छा नहीं समझा जाता था। उन्होंने उनके प्रति कोई ग़लत धारणा नहीं बनाई, न हम लोगों से वैसा करने के लिए कहा। मैं अपने इस लक्ष्य से अभी दूर हूं। संक्षेप में कहा जाए तो वह किसी की भी, कहीं भी और किसी भी तरह की मदद करने को तैयार रहते थे।
उन्होंने जो सहयोग और निवेश किया उसमें उनकी शक्ति, समय, भौतिक क्षमताएं और संपर्क शामिल थे। उन्होंने साधारण आदमियों को संत बनाने के लिए लक्ष्य निर्धारित किए! काश, 'पार्ट टाइम शिव' नाम की कोई धारणा होती, ताकि आप और मैं कम से कम उस बेंचमार्क तक पहुंचने की बात तो सोच सकते!
मज़ाक से इतर, आइए, सेवा को और गहराई से जानने के लिए कुछ लोगों के विचार सुनें!
एफसी शर्मा जी गुरुदेव के वरिष्ठतम शिष्यों में से एक थे। वह विनम्रता के प्रतीक थे। वह गुरुदेव का संदेश दे रहे हैं।
एफसी शर्मा जी: वह हमेशा कहते थे कि मैं यहां मौज-मस्ती के लिए नहीं आया हूं। मैं यहां इन लोगों को जगाने और उनसे कहने आया हूं, "उठो। ईश्वर है और वह तुम्हारे निकट है। उसकी तलाश में इधर-उधर क्यों भागते हो?बस उसे याद करो और सेवा करो। सभी को ईश्वर का स्वरूप समझो।"
गुरुदेव की शिक्षाएं एक वाक्यों की तरह थीं। उन्होंने गिरि जी से सेवा के बारे में जो कहा था, उसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।
सवाल: सेवा से गुरुदेव का क्या मतलब था?
गिरि जी: उन्होंने सेवा का अर्थ यह बताया कि जो कोई भी आपके पास कोई भी समस्या लेकर आए, सेवा करके उसकी समस्याओं का समाधान करें।
सवाल: यह कोई भी समस्या हो सकती है?
गिरि जी: कोई भी समस्या, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक। उन्होंने इनके समाधान के लिए बहुत सारे आध्यात्मिक मंत्र दिए थे।
सवाल: तो क्या किसी व्यक्ति की सभी समस्याएं मंत्रों से हल हो सकती हैं?
गिरि जी: हां,मंत्र और सेवा। केवल मंत्र नहीं।
सवाल:तो...
गिरि जी: समर्पण और विश्वास।
सवाल:समर्पण और विश्वास किसमें...
गिरि जी: अपने गुरु में। गुरु में।
आगे बिट्टू जी गुरुदेव के सेवा दर्शन को समझा रहे हैं।
बिट्टू जीः सेवा उनका आदर्श वाक्य था। उनको लगा कि उन्हें लोगों के लिए वह सबकुछ करना चाहिए, जो वह कर सकते हैं। उन्होंने कभी भी अपने शरीर की चिंता नहीं की। अगर लोग उनसे मिलने के लिए खड़े हैं और अगर उन्हें बुख़ार हो या सर्दी लग गई हो, आख़िर वह भी एक इंसान ही तो थे, लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। उन्होंने अपनी समस्याओं को किनारे किया। अपने बारे में कभी नहीं सोचा।
उनके रहस्यमय आध्यात्मिक गुरु, बुड्ढे बाबा ने ही उन्हें इस अवतार में आध्यात्मिक सेवा के लिए तैयार किया था। ओम, त्रिशूल, नंदी, गणपति जैसे शिव से जुड़े सभी चिह्न उनके हाथों और शरीर के अन्य अंगों पर प्रकट हुए थे। अपनी इन शक्तियों का उपयोग उन्होंने लोगों की भलाई के लिए किया। गुरुदेव गायत्री मंत्र का जाप करते थे, बुड्ढे बाबा ने उसे महागायत्री मंत्र में बदल दिया। इसके जाप के कारण आगे आने वाले सालों में गुरुदेव की आध्यात्मिक प्रगति बड़ी तेज़ी से हुई।
नागपाल जी कृषि मंत्रालय में गुरुदेव के सहयोगी थे। दोनों सरकारी कैंप में कई-कई महीने साथ रहते थे। वह मध्य प्रदेश में कुरवाई नामक जगह पर आयोजित किए गए पहले सार्वजनिक उपचार कैंप के गवाह थे। गुड़गांव से बाहर पहली बार यह कैंप लगाया गया था। इसके बाद, कुरवाई से लगभग 70 किलोमीटर आगे अशोक नगर में बहुत बड़े पैमाने पर कैंप आयोजित हुआ।
नागपाल जी एक दशक पहले गुज़र गए। हमारे लिए उनकी बातों को दोबारा रिकॉर्ड करना संभव नहीं है। तो, थोड़ी ऑडियो की गड़बड़ी को सहन करते हुए इसे सुनें।
नागपाल जी:फिर उसके बाद हमारा कैंप अशोक नगर के पास लगा। कैंप जहां लगाया गया वह काफ़ी अंदर के इलाक़े में था। जनता आने लगी। जिन लोगों के घुटनों में दर्द होता था,यानी जो लोग दर्द के कारण अपनी बैलगाड़ियों में बैठकर आते थे, वे अपने पैरों से दौड़ते हुए वापस जा रहे थे।इतने अधिक लोगों को देखकर मैं तो चकित था। मैं सोचता था कि क्या गुरूजी कोई जादू-टोना करते हैं?कुरवाई में जो स्थिति थी वह तो थी ही, लेकिनगुना में हालत ऐसी थी कि वहां सैकड़ों बैलगाड़ियां इंतज़ार कर रही थीं। हर गाड़ी में 15-20लोग सवार थे। ये लोग बीमार थे और स्वस्थ होने के लिए आए थे। 1973-74में ऐसा पहली बार हुआ था।
आगे आ रहे हैं नौबतराम जी। वह शिवपुरी में गुरुदेव के पड़ोसी रह चुके हैं। इन्होंने शुरुआती सालों में गुरुदेव के साथ बहुत समय बिताया है।
सवाल:तो, आप उन्हें कैसे जानते थे?
नौबतराम जीः पहली बात तो यह किवह मेरे पड़ोसी थे और दूसरी बात यह कि मेरे बेटे को समस्या थी।
सवाल:क्या समस्या थी?
नौबतराम जीःउसे एलर्जी थी।
सवाल: अच्छा।
नौबतराम जीः उन्होंने कहा कि जब भी बेटे को कोई परेशानी हो,रात में या कभी भी, आप मुझसे संपर्क करें। इसलिए,जब भी उसे कोई समस्या होती, मैं रात में कभी-कभी 11 बजे, 1 बजे और यहां तक कि 2बजे भी उनके पास पहुंच जाता था।भले ही वह ध्यान कर रहे हों, पर मुझसे बात करते और कहते,"अब आप घर जा सकते हैं।" जब मैं घर पहुंचतातो मेरा बेटा स्वस्थ मिलता था।
जिस दिन से गुरुदेव ने सेवा शुरू की, दिन और रात चौबीस घंटे लोगों के लिए उपलब्ध रहते थे। उन्होंने अपनी असुविधा या परिवार की ज़रा भी परवाह नहीं की। जैसे-जैसे लोगों की संख्या बढ़ती गई, उन्होंने अपनी सेवा देने का समय भी बढ़ा दिया।
सुभाष सभरवाल गुरुदेव के स्कूल के पुराने साथी थे जो गुरुदेव के अंतिम कुछ सालों में उनके साथ जुड़ गए थे। हालांकि उन्हें अध्यात्म में रुचि नहीं थी, लेकिन फिर भी वह गुरुदेव से प्रभावित थे। वह महागुरु की उदारता को याद कर रहे हैं।
सुभाष जीः वह कुछ अलग क़िस्म के इंसान थे। वह किसी की शादी का इंतज़ाम कर रहे थे। खाना-पीना, रहने-खाने का इंतज़ाम, कपड़े-लत्ते देना, सारा इंतज़ाम गुरूजी कर रहे थे। यहां पर सामूहिक विवाह का आयोजन किया गया था। सारा ख़र्च गुरूजी ने उठाया था। गुरुजी ने अपना प्रोविडेंट फ़ंड निकालने में भी देर नहीं लगाई। सारा पैसा सेवा में खर्च कर दिया।
सुभाष जी से अब शिवपुरी की ओर चलते हैं।
रीवाइन्ड।
माताजी बताती हैं कि कैसे 1974 में गुड़गांव के शिवपुरी में उनके घर पर सेवा शुरू हुई थी। अध्यात्म और सेवा के क्षेत्र में गुरुदेव नए-नए ही थे। हालांकि, अब तक उन्हें बुड्ढे बाबा की मदद और सुरक्षा मिलने लगी थी लेकिन अभी उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली थी।
गुड़गांव के शिवपुरी में पहला मामला आध्यात्मिक राजनीति और गुरु अवहेलना का आया। एक महिला ने अपने उस गुरू का अपमान किया, जिन्होंने उसे संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था। उस गुरु ने महिला को शाप दिया था कि हर गर्भावस्था के चौथे महीने में उसका गर्भपात हो जाएगा। गुरुदेव ने महिला की हिमायत करते हुए आध्यात्मिक हमले का सामना किया, लेकिन डटे रहे।
दुर्भाग्य से, उस महिला ने गुरुदेव की कही बातें मानी नहीं और उसे उसकी क़ीमत चुकानी पड़ी।
सुनिए।
माताजीःधीरे-धीरे लोग हमारे घर आने लगे। शुरुआत में दो महिलाएं आईं। उनमें से एक संतान चाहती थी। उसके गुरु ने उसे शाप दिया था कि उसके बच्चे नहीं होंगे। यह एक लंबी कहानी है। जब वह 4 महीने की गर्भवती थी तो उसके गुरु ने उसे शाप दे दिया था। दरअसल, उसके गुरू उसके घर पधारे थे। महिला के पति ने कहा कि गुरू को कुछ देकर विदा करना चाहिए। उनके घर एक बच्चा आने वाला है और यह गुरू के आशीर्वाद से ही संभव हुआ है। महिला ने गुरु से पूछा कि वह क्या चाहते हैं। गुरू से बच्चे का आशीर्वाद पाकर वह बहुत खुश थी। गुरु ने कहा कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए,बस का किराया 1.25 पैसे है, तो क्या वह उनकी आगे की यात्रा के लिए इतने पैसे दे सकती है? लौटती यात्रा के पैसे वह किसी और से ले लेंगे. लेकिन महिला ने उन्हें पैसे नहीं दिए। जाते समयगुरु ने उसे शाप दे दिया कि वह जैसी है वैसी ही रहेगी, उसका वंश आगे नहीं बढ़ेगा। उसके बाद,वह हर साल गर्भवती होती तो थीलेकिन 4 महीने बाद गर्भपात हो जाता। यह एक अभिशाप था। इसे दूर करने के लिए वह गुरुजी के पास आई थी।
उस समयगुरुजी ने कहा कि वह अभी कुछ नहीं करेंगे क्योंकि उसी समय हमारी बेटी छुटकी का जन्म हुआ था। लेकिन उसे 40 दिनों के बाद गुरुवार को आने के लिए कहा। फिर जब वह दूसरी बार आईतो उसके गुरु की आत्मा उसके भीतर आ गई थी। गुरू की आत्मा ने गुरुजी से सवाल किया कि उसने अपनी शिष्या को शाप दिया है, तो वह उस स्त्री को संतान का आशीर्वाद भला क्यों दे रहे हैं? गुरूजी ने कहा, महिला उनके दरबार में मदद मांगने आई है, तो वह उसकी मदद अवश्य करेंगे। गुरूजी ने उस गुरु से कहा, “तो फिर आप अपने शिष्यों को यहां न भेजें। मैं उन्हें बुलाने नहीं जाता। वे ख़ुद चलकर आए हैं तो मैं उनकी मदद करूंगा।” तब महिला के गुरु ने कहा कि उसे माफ़ी मांगने के लिए उनके स्थान पर भेजें। गुरुजी ने महिला से कहा कि वहां जाओ लेकिन वहां से कुछ भी लेना मत, बस सिर झुकाकर माफ़ी मांग लेना। सो, जब वह महिला वहां गई तो उसे उस स्थान के लोगों ने उसे एक तावीज़ दिया, और उसका एक और गर्भपात हो गया। वह जान ही नहीं पाई कि यह कैसे हुआ।
सवाल: फिर ?
माताजीः जब गुरु की आत्मा उस महिला के शरीर में आईउसी समय हमारे स्थान में आग लग गई।
सवाल:शिवपुरी में?
माताजीः हां। गुरुजी ने मुझे अंदर नहीं आने दिया, क्योंकि अंदर आग लगी थी। उन्होंने आग बुझाई, कमरे की सफ़ाई की और फिर महिलाओं को घर भेज दिया।
सवाल:तो, इन दोनों महिलाओं के आने के बाद….
माताजीः इसके बाद लोगों का आना शुरू हुआ और संख्या बढ़ने लगी।
सवाल: बढ़ती रही...
हर महीने सेवा के लिए निर्धारित गुरुवार को आने वालों की संख्या 40 से 50 हज़ार तक पहुंच गई। लंबी-लंबी लाइनें लगती थीं। इस दिन को 'बड़ा गुरुवार' कहा जाने लगा।
गुरुदेव ने कथोग, रेणुका, अशोक नगर, आदि कैंप्स में सामूहिक उपचार किए। रोज़ाना हज़ारों की तादाद में लोग आते थे। लाखों लोगों ने इन कैंप का फ़ायदा उठाया। ये कैंप कभी-कभी दूरदराज़ के इलाक़ों में भी लगाए जाते थे।
दो दशकों में उन्होंने अपने शिष्यों की मदद से लाखों लोगों को राहत पहुंचाई और उन्होंने बुड्ढे बाबा, परशुराम जी, भगवान शंकर, अश्विन कुमार, पूर्व संतों और आध्यात्मिक हस्तियों के साथ-साथ कई देवी-देवता की मदद से लोगों के काम किए। यह एक आध्यात्मिक अभियान की तरह था।
गुरुदेव एक दिव्य आत्मा थे जिनका जीवन एक उदाहरण बना और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रकाशस्तंभ बन गया।
वास्तव में, उन्होंने अधिकतर सेवा सूक्ष्म रूप में की। वह पाठ करने बैठते थे। यह एक प्रकार की समाधि थी। इस अवस्था में वह अपना शरीर छोड़कर मदद और उपचार चाहने वालों के पास सूक्ष्म रूप में पहुंचते थे।
गुरुदेव जीवन भर अपनी क्षमता से अधिक उदार इंसान बने रहे। हो सकता है कि उनके पास फ़ालतू खर्च करने के लिए पैसे न हों, लेकिन वह सेवा के अपने मिशन के लिए अपना समय और शरीर का योगदान देने में विश्वास करते थे। उनकी साधना बहुत ही कम ख़र्चीले स्तर पर होती थी। इमारतें और आश्रम खड़े करने का कोई सवाल ही नहीं था, इसलिए उन्होंने घरों में ही मंदिर बनाए जिन्हें स्थान कहा जाता है। नाममात्र की लागत के साथ शिष्यों के घरों पर सेवा का आयोजन किया जाता था और ऐसे कई स्थान बनाए गए थे।
सुनिए गिरि लालवानी क्या कह रहे हैं
सवाल:बहुत सारी जगहों पर स्थान खोलने के पीछे गुरुदेव का क्या दर्शन था?
गिरि जीः ऐसे बहुत से लोग हैं जो गुड़गांव आने का ख़र्च नहीं उठा सकते थेइसलिए ऐसे लोगों तक पहुंचने के लिए उन्होंने स्थान खोले । आप कह सकते हैं कि वह सेवा की मार्केटिंग में थम्स अप,कोक या पेप्सी जैसी चीज़ों की मार्केटिंग की तरह कुशल थे। इसे सभी तक पहुंचना चाहिए, (हंसते हैं)। सेवा दुनिया भर में हर एक को दी जानी चाहिए, न केवल भारत में, बल्कि हर जगह। यही एकमात्र कारण है। थोड़े समय के भीतरउन्हें ज्यादा पैसा खर्च किए बिना, सेवा मिलनी चाहिए.
प्रताप सिंह गुरुदेव के बॉस थे और वह नास्तिक थे। हालांकि इतने सालों की जान-पहचान से उनकी नास्तिकता पर असर नहीं पड़ा, लेकिन वह अपने जूनियर का सम्मान अवश्य करने लगे और उनके काम में रुचि लेने लगे।
ऑफ़िस के बॉस के सामने यह प्रमाणित हो चुका था कि गुरुदेव का अपना कोई निजी जीवन नहीं था। उन्होंने अपना पूरा वक़्त और जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर दिया था। इससे यह भी साबित हो रहा था कि किसी व्यक्ति की अच्छाइयों की ख़ुश्बू उसके करियर की मजबूरी या परिवार की ज़रूरतों के कारण छुपी नहीं रह सकती। वह हमेशा उन लोगों के लिए उपलब्ध रहते थे, जिनको उनकी ज़रूरत होती थी।
प्रताप सिंह जी का देहांत कुछ वर्ष पूर्व हो गया, वरना हमें उनसे दोबारा बातचीत करने में प्रसन्नता होती। लेकिन चूंकि यह संभव नहीं है, इसलिए आपको थोड़ा और ऑडियो डिस्टर्बेंस सहना पड़ेगा।
प्रताप जी: वह बहुत सीधे और सरल इंसान थे। उनका कोई निजी जीवन नहीं था। उनके पास अपने लिए समय नहीं था। 2 मिनट के लिए वह घर जाते और 50 लोग उनसे मिलने के लिए इंतज़ार कर रहे होते,कारें उनका इंतज़ार करतीं। वह बड़े ही सज्जन और एक ऐसे इंसान थे जो लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। लोगों का दर्द कम करते थे। यहां तक कि कैंसर और दूसरी बीमारियों में भी राहत देते थे।
ऑफ़िस में गुरुदेव अक्सर अपने वेतन का कुछ हिस्सा ज़रूरतमंदों को बांट देते थे। उनके ऑफ़िस के नीचे पहरेदार की तरह तैनात रहने वाले गुप्ता जी, जो चाय की दुकान चलाते थे, इस बात की गवाही देते हैं ।
सवाल: मैंने सुना है कि गुरुजी बहुत पहले से ही ज़रूरतमंद लोगों को अपने वेतन का हिस्सा बांटने लगे थे।
गुप्ता जीः जी हां, वह लोगों को अपने वेतन के पैसों से मदद करते थे।
सवाल: क्या आपने उन्हें ऐसा करते हुए देखा है?
गुप्ता जीः जी हां, मैंने देखा है। लोग गुरुदेव की तनख्वाह में से थोड़ा-थोड़ा हिस्सा लेने के लिए क़तार में खड़े रहते थे। किसी को 100 रुपए तो किसी को 200रुपए देते थे।
सवाल: लोग क़तार में खड़े रहते थे?
गुप्ता जीः जी हां, कुछ लोग ऑफ़िस के होते थे, कुछ बाहर के। ज़्यादातर तो ऑफ़िस के ही होते थे।
गुरुदेव ने थोड़ा होते हुए भी बहुत सारे लोगों की मदद की।
हम आम तौर पर कहते थे कि गुरुदेव को ऑफ़िस में लोग लूट रहे थे, लेकिन उन्होंने इसे कभी इस तरह से नहीं देखा। वास्तव में, जब उनके एक शिष्य ने पूछा कि हर कोई अपनी चाय का ख़र्च आपके ख़ाते में क्यों डाल देता है, तो उन्होंने कहा, "वो कल भी पीते थे, हम कल भी पिलाते थे। वो आज भी पीते हैं, हम आज भी पिलाते हैं। वो कल भी पियेंगे, हम कल भी पिलाएंगे।", तो उनका रवैया ऐसा था।
आनंद पाराशर गुरुदेव के मातहतों में से एक थे। उन्होंने गुरुदेव के साथ काम किया और साथ-साथ उनकी पूजा भी की।
आनंद जीः उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया। हमने उन्हें ऐसा करते कभी नहीं देखा। सच कहूं तो उन्हें समय ही नहीं मिलता था। ज्यादातर लंच के समय वह लोगों से मिलते थे, क्योंकि लोग ऑफ़िस के बाहर उनका इंतज़ार करते रहते थे। हम उन्हें बताते थे,“गुरुजी,लोग आपका इंतज़ार कर रहे हैं। क्या आप आ सकते हैं?"उनका मानना था कि अगर लोग किसी उम्मीद के साथ उनसे मिलने आए हैं,तो मदद करना उनकी ज़िम्मेदारी है। चूंकि उन्हें ये सारी शक्तियां प्रकृति से मिली थीं, इसलिए वह मदद से कभी नकार नहीं सकते थे। वह हमेशा मदद के लिए तैयार रहते थे।
ये कुछ उन लोगों के उदाहरण थे जो गुरुदेव को आश्चर्य के साथ देखते थे।
हमने महसूस किया कि हम लोगों की तारीफ़ तो बड़ी आसानी से कर लेते हैं, लेकिन उतनी ही आसानी से उनकी नक़ल नहीं कर सकते। लेकिन यह तो प्रमाणित है कि गुरुदेव कोई साधारण इंसान नहीं थे कि हम सब उन जैसे आसानी से बन जाते।
बिट्टू जी सेवा को लेकर गुरुदेव के रवैये की एक हृदयस्पर्शी कहानी बता रहे हैं। वह लोगों की सेवा ब्राउनी पॉइंट अर्जित करने या स्वयं को या दूसरों को प्रभावित करने के लिए नहीं करते थे। यह उनकी चेतना की भावुकता थी, जो उन्हें लोगों की सेवा के लिए स्वाभाविक रूप से प्रेरित करती थी।
सवाल: मैंने देखा है कि जब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से महान हो जाता है, तो वह दूसरों के साथ ज्यादा बातचीत नहीं करता है। क्या उनके साथ भी ऐसा ही था? या वह सभी से बातचीत करते थे? उनका स्वभाव कैसा था?
बिट्टू जीः जो कोई भी उनसे मिलने आता, फिर बहुत सारे लोग ही क्यों न हों, वह सबसे मिलते थे। उनके सुख-दुख में और उनकी परेशानियों में शामिल होते थे। उन्होंने कभी, किसी को भी ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि वह पराया है। लोग उनसे मिलने का इंतज़ार करते थे; लोगों को लगता था कि गुरुजी केवल उनके ही हैं।
सवाल: रोजाना कितने लोग गुरुजी के दर्शन करने के लिए आते थे? बड़ा गुरुवार पर या उनके जीवन के उच्चतम दौर में मिलने आने वाले लोगों की संख्या कितनी थी?
बिट्टू जीः शिवरात्रि और गुरु पूजा के मौके पर उनके दर्शन करने के लिए भारत और दुनिया भर से लोग आते थे। लगभग 75 हज़ार, 80 हज़ार , 60 हज़ार तक लोग उनसे मिलने के लिए आते थे। बड़ा गुरुवार पर 15 से 20 हज़ार लोग उनसे मिलते थे। शिवरात्रि या गुरु पूजा पर तो उत्सव 2-3 दिनों तक चलता था। बड़ा गुरुवार को उनसे मिलने के लिए लोगों को बारह-बारह घंटे का इंतज़ार करना पड़ता था। कभी-कभी तो बड़ा गुरुवार बुधवार दोपहर या शाम से ही शुरू हो जाता था, और शुक्रवार की सुबह तक चलता था। गुरु पूजा 5 दिनों तक चलती थी और लोग उन्हें देखने के लिए 5-5 दिन का इंतज़ार करते थे। शिवरात्रि 2-3 दिनों तक चलती थी।
सवाल: गणित के हिसाब से एक सवाल उठता है। यदि आप कह रहे हैं कि 60 हज़ारलोग उनसे मिलने आते थे, तोमान लीजिए वह एक मिनट में एक व्यक्ति से मिले; तो 18 घंटे में वह सिर्फ एक हज़ार लोगों से ही मिल सकते थे।
बिट्टू जीः शिवरात्रि और गुरु पूजा पर, इन उत्सवों के दौरान गुरुजी किसी से बात नहीं करते थे।
सवाल: फिर वह कितने लोगों से मिलते थे?
बिट्टू जीः उनकी रफ़्तार बड़ी तेज़ थी। वह चलते जाते और क़तार में खड़े लोगों को आशीर्वाद देते जाते थे। कई बार एक सेकेंड में 2-3 लोगों को आशीर्वाद दे देते थे। कभी-कभी उनकी आंखों से आशीर्वाद मिलता था। वह बैठते नहीं थे। गुरु पूजा 5 दिनों तक चलती थी क्योंकि वह बैठकर लोगों को नारियल और आशीर्वाद देते थे। इसलिए लोगों से मिलने में 4 से 5 दिन का समय लग जाता था। शिवरात्रि पर वह अपने घर के बाहर निकलते और एक घंटे तक लोगों को आशीर्वाद देते थे। कभी-कभी एक मिनट में 15-20 लोगों को भी आशीर्वाद दे देते थे।
सवाल: इतनी बड़ी तादाद में यानी 40,50 60,000लोग आते थे तो उनकी देखभाल कैसे होती थी?
बिट्टू जीः लोगों के लिए लंगर होता था। उनके रहने-खाने का इंतज़ाम किया जाता था। बाहर से आने वालों के लिए हम अपने ख़र्च पर इंतज़ाम करते थे। पहले, जब हमारे पास जगह नहीं थी, हम समाज के लोगों से अनुरोध करते थे कि इन लोगों को रहने के लिए अपने घर में जगह दें। कोई दो कमरे दे देता था, कोई तीन। इस तरह से हम आने वाले लोगों को ठिकाना देते थे। लंगर हमारे स्थान पर होता था। हम अपने संसाधनों और क्षमता के अनुसार उन्हें अच्छी से अच्छी सुविधाएं देने की कोशिश करते थे।
गुड़गांव स्थान के प्रबंधन के चार प्रमुख लोग थे। बिट्टू, जो एक तरह से गुरुदेव का दत्तक पुत्र कहेलाया जा सकता है, गुरुदेव का भांजा गग्गू, निक्कू, उनकी पत्नी का भतीजा और पप्पू, जो भतीजा नहीं था!
जहां तक व्यवहार की बात है, इन चारों में से कोई भी ग़लत तरीक़े से बात नहीं करता था। लेकिन अगर कोई गुरुदेव से बुरा सलूक़ करे, तो वह भले ही देवी-देवताओं से बच सकता था, लेकिन इन चारों से नहीं।
वे गुरुदेव को अपना मानते थे, उन पर अपना अधिकार मानते थे और हमेशा उनके आराम की फ़िक्र करते थे। महागुरु उनसे अक्सर आग्रह करते थे कि उन्हें खाने-पीने के लिए मजबूर न किया जाए और उन्हें अपनी गतिविधियों को जारी रखने दिया जाए। मुझे लगता है कि आप उन्हें स्थान के 'चार मसखरे' कह सकते हैं।
आइए, निक्कू जी और पप्पू जी से चर्चा करते हैं।
सवाल: क्या आप हमें गुरुदेव की दिनचर्या के बारे में बता सकते हैं?
निक्कू जीः वह सुबह लगभग 6या 6.30बजे उठते थे और तैयार होकर ऑफ़िस के लिए निकल जाते थे। कभी-कभी वह दोपहर दो-ढाईया तीन बजे भी घर आ जाते थे और अगर किसी दिन देर हो जाती तो वह सीधे फार्म पर निकल जाते और शाम सात या आठ बजे तक घर लौटते थे।
सवाल: शाम 7 या 8 बजे तक घर आने के बाद वह क्या करते थे?
निक्कू जीः अगर लोग वहां उनका इंतज़ार कर रहे होते तो वह उनसे मिलते थे। अगर वह जल्दी यानी 2.30या 3.00 बजे घर आ जाते तो वह अपना पाठ करते थे, जो घंटों तक चलता था। कभी-कभी वह अपना पाठ जल्दी पूरा कर लेते थे। लोग 11.30या 12.00बजे तक उनका इंतज़ार करते थे। यह एक निर्धारित दिनचर्या थी। उसके बाद लोग चले जाते थे। क्योंकि फिर वह लोगों से नहीं मिलते थे। यदि गुरुजी 8.30-9.00 बजे तक या 10.00 बजे तक भी अपना पाठ समाप्त कर देते तो वे पूछते थे "कितने लोग हैं?"50-60 के आसपास होते तो वह उनसे मिलते और आशीर्वाद देते थे। उनका आशीर्वाद ही काफ़ी होता था।
सवाल: तो, उनकी बहुत तनावपूर्ण और व्यस्त जीवन शैली थी?
पप्पू जीः नहीं, यह उनकी सामान्य दिनचर्या थी उन्होंने इसे व्यस्त जीवन शैली के रूप में नहीं लिया क्योंकि वह फ्री मूड में रहते थे। वह देर रात 2.00 बजे बहुत कम लोगों से मिलते थे, सभी से नहीं। 11.30 या 12.00 बजे तक वह अपने काम निपटा लेते और फिर 2.00 बजे तक अपने शिष्यों से मिलते थे। रात 2.00 बजे, 2:30 बजे या 3.00 बजे के बाद वह खाना खाते थे। कभी-कभी तो ऐसा होता था कि हमने भी सुबह 4.00 या 5.00 बजे खाना खाया हो।
निक्कू जीः सोने का कोई निश्चित समय नहीं था।
पप्पू जीः नहीं, कोई पक्का समय नहीं था।
निक्कू जीः जैसे कि हम 11.00, 11.30 या अधिकतम 12.00 बजे तक सोते हैं, ऐसा कुछ नहीं था। खाने का भी कोई समय निर्धारित नहीं था।
पप्पू जीः रात के खाने का समय आमतौर पर 2.00 बजे के बाद ही होता है। सामान्य दिनचर्या में भी यही समय होता था।
गुरुदेव ने कभी भी सेवा को शौक़ की तरह नहीं लिया। उन्होंने इसे ऐसे माना जैसे यह उनका मुख्य काम है। उनके जीवन में दिन बड़ा लंबा खिंचता था, लेकिन वह किसी तरह दिन और रात में संतुलन साधने में कामयाब हो जाते थे।
जब वह मरीज़ों और आगंतुकों से मिल चुके होते थे, तब हम उनके पास बैठते थे और उन्हें परेशान करते थे। हम उनके कमरे में घुस जाते थे और बेशर्मी से रात 2.00 बजे तक वहीं बैठे रहते थे। कहा जाए तो गुरुदेव दिन-रात काम करता थे।
बिना थके हुए निःस्वार्थ सेवा करने के संस्कार ने हम लोगों पर भी कुछ असर डाला। हम भी उन्हें देखकर, उनकी तरह काम करने की कोशिश करते थे।
आइए गिरि जी से कुछ जानते हैं।
गिरी जीः वह हमेशा तरोताज़ा और मुस्कुराते रहते थे। मैंने उन्हें कभी भी थका हुआ नहीं देखा।
सवाल:क्या आपने कभी उनसे पूछा कि वह इस तरह तरोताज़ा कैसे रह पाते हैं?
गिरी जीः नहीं...(हंसते हैं) असल में मैंने उन्हें कभी सोते हुए भी नहीं देखा। मैंने उनसे पूछा "गुरुदेव जी, आपको नींद नहीं आती?"उन्होंने कहा "बेटा,अगर गुरु सो जाएगा तो सब कुछ ख़त्म हो जाएगा ,मैं कैसे सो सकता हूं?"उनका मतलब था कि एक गुरु कभी सो नहीं सकता; गुरु को चौबीसों घंटे जागना पड़ता है। वास्तव में उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया, लेकिन मैंने महसूस किया कि उनकी सेवा दुनिया भर में चलती रहती थी। दिन या दोपहर को यहां सेवा होती थी और यहां रात होते ही शिकागो, कनाडा या किसी और स्थान में उनकी सेवा होने लगती थी। सेवा का समय अलग-अलग होता था। सेवा के समय सभी शिष्य उनको याद करते थे। उनका नाम लेते थे। इसका मतलब ही यह है कि वह उन्हें स्वस्थ करते थे। बिना उनकी मदद के उनके शिष्य किसी को ठीक नहीं कर सकते थे। तो वह कहते थे कि मुझे जागना होगा। मुझे यह देखना होगा कि हर कोई ठीक होकर जाए। जिसे जो चाहिए, वह उसे मिलना चाहिए।
नींद गुरुदेव के लिए कुछ अलग ही बात थी। नींद के दौरान वह अक्सर पाठ पर चले जाते थे और अपना भौतिक शरीर छोड़कर सूक्ष्म यात्रा पर निकल जाते थे। और फिर वह 2, 3, 4 घंटे के बाद अपने शरीर में फिर से प्रवेश कर लेते थे। यह हमारे लिए किसी अचंभे से कम नहीं था, क्योंकि हम लोगों को इस बारे में कुछ भी नहीं पता था।
हम नहीं जानते कि वह बिना सोए कैसे जीवित रह पाए, क्योंकि हम उनके साथ रात 2.00 बजे तक बैठे रहते थे और फिर वह सुबह 5.00 बजे उठकर अपना कामकाज कर रहे होते थे। तो, यह हम में से अधिकांश के लिए दिमाग़ को चकरा देने वाली बात थी। लेकिन आख़िर में हम लोगों को पता चल गया कि उनकी नींद की ज़रूरत बहुत कम थी और उनमें यह हुनर था कि वह अपने आधे शरीर को जगाए हुए रख सकते थे और बाक़ी आधा शरीर नींद में रह सकता था।
बहुत ही सुविधाजनक। बहुत कामयाब।
राजपाल जी बताते हैं कि उन्होंने गुरुदेव को अन्य आध्यात्मिक गुरुओं से इतना अलग क्यों पाया। वह एक दिलचस्प बात बताते हैं कि गुरुदेव कभी भी किसी के कर्जदार नहीं बने। न धन और न ही दान के रूप में किसी का एहसान लिया। एक वाक्य में, वह ख़रीदी जा सकने वाली चीज़ नहीं थे और इसलिए हर काम उन्होंने एक अजब तरीक़े से किया।
राजपाल जीः मैं जहां भी गया वहां भक्तों को पैसे चढ़ाते देखा और सभी संत उन पैसों को स्वीकार भी करते थे। लोग उनके लिए खाना लेकर आते तो पहले वह खाते, बाक़ी लोग बाद में। उनके रहने के लिए आरामदायक इंतज़ाम किया जाता था। लेकिन मैंने कभी गुरुजी को किसी से पैसे लेते नहीं देखा। मसलन, एक सिख व्यक्ति को सिरदर्द था। इसलिए गुरुजी ने कहा,"बेटा, मैं तुम्हें अभी ठीक कर दूंगालेकिन तुम अब मांस नहीं खा सकते और न ही शराब पी सकते हो।" दो सप्ताह बादवह व्यक्ति गुरुजी के लिए एक ब्रीफ़केस लेकर आया। गुरुजी ने उससे पूछा कि इसमें क्या है। उसने कहा, "गुरुजी, मुझे लंबे समय से सिरदर्द की शिकायत थी। मैं बड़े-बड़े अस्पतालों में भी गया था। फिर मैंने तय किया कि जो मेरा सिरदर्द ठीक कर देगा उसे मैं एक लाख रुपये दूंगा। आपने बिना किसी दवाई के मेरा सिर दर्द ठीक कर दिया। मैं पिछले 15 दिनों से बिना सिर दर्द के सो रहा हूं। अब मुझे ये पैसा आपको देना है।”गुरुजी ने कहा,"अगर मैं ये पैसे ले लूं, जैसे ही मैं ब्रीफ़केस को छू लूं,तुम्हारा सिरदर्द वापस आ जाएगा।" इस घटना के बाद मैंने महसूस किया कि यह आदमी अलग था। वह अन्य संतों की तरह नहीं था।
गुरुदेव सेवा में भौतिक योगदान पर विश्वास करते थे।
कभी-कभी अजनबी को भी यह महसूस होता था कि सफारी सूट में किसी किसान का हाथ काम कर रहा है।
गिरिजी याद करते हैं
गिरि जीः गुरुजी खेती-किसानी में इतने रच-बस जाते थे कि उन्हें अपने अच्छे से इस्त्री किए हुए कपड़ों की भी परवाह नहीं रहती थी। सफ़ेद पैंट, सफेद शर्ट जूते मिट्टी में सने रहते थे। मैंने उनसे एक बार पूछा था कि आप किसानी से इतना प्यार क्यों करते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि गुरु नानक देव जी को भी खेती से प्रेम था। उन्होंने कहा,"मैं चाहता हूं कि मैं अपनेहाथ से अन्न उगाऊंऔर अपने ही हाथ से लंगर बनाऊं। और इधर-उधर से आने वाले अपने भक्तों और शिष्यों को खिलाऊं।" लोग उनके पास आएं, रहें और खाएं-उन्हें यह बात बहुत पसंद थी। वह लोगों से प्यार करते थेऔर वह सभी को अपने हाथ से खाना खिलाना चाहते थे।और अक्सर वह ऐसा करते भी थे।
सेवा को लेकर उन्होंने मनुष्य और पशु में अंतर नहीं किया! उन्होंने सभी जीवन स्वरूपों को अपना ही विस्तार माना। इससे मुझे प्रेरणा मिली कि मुझे कीड़े-मकोड़ों के साथ भी सम्मान के साथ पेश आना चाहिए। उन्हें रेंगने वाला तुच्छ प्राणी नहीं समझना चाहिए! मैंने 'अहम् ब्रह्मास्मि' की अवधारणा का इससे अच्छा नमूना कहीं नहीं देखा।
'अहम् ब्रह्मास्मि' का अर्थ है कि मैं खुद को एक सीमित पहचानयोग्य व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि अज्ञात ब्रह्मांडीय अस्तित्व के एक हिस्से के रूप में देखता हूं।
व्यक्ति की चेतना को स्वयं को 'जीवात्मा' नहीं तो 'आत्मा' या 'परमात्मा' के रूप में देखने के लिए भौतिक बंधनों और पहचान से आगे जाना पड़ता है।
आगे आप देखेंगे कि एक न्यायाधीश का निर्णय किस तरह वैधता के मामलों में नहीं बल्कि मानवता के मामलों पर होता है।
सुनते हैं वीरेंद्र जी को।
सवाल: आपने गुरुदेव में जानवरों के प्रति कैसा प्रेम देखा?
वीरेंद्र जी: उनमें जानवरों के प्रति प्रेम बहुत गहरा था। वह खेतों में जाते थे।वह गायों को दुहते थे उन्हें अपने हाथों से चारा खिलाते थे। उन्होंने कुत्ते पाले थे। उनकी सेवा करते थे, प्रेम करते थे। एक दिन मैं उनके खेत पर गया। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह भी वहां आएंगे। मैंने कुत्तों पर कुछ पिस्सू देखे थे। इसीलिए मैं अपने साथ लाल दवा लेकर गया था और कुत्तों को साफ करके उन्हें दवा लगा रहा था। अचानक वह आ गए और मेरी पीठ को थपथपाकर एक ही वाक्य बोले, “तू मेरा बेटा है”। सिर्फ इसी एक वाक्य में मैंने दुनिया का सारा प्यार महसूस कर लिया। उनके प्रेम से मेरा रोम-रोम भीग गया था। वह ऐसे इंसान थे।
सभी श्रोताओं से विनम्र अनुरोध है कि वे गुरुदेव के जीवन से यह सबक़ सीखें कि सभी जीव समान हैं। जीवन के सभी रूपों की जितनी संभव हो, सेवा करें।
सेवा ही हम सबके लिए उनकी विरासत है।
यदि सेवा से गांव का एक लड़का आध्यात्मिक महापुरुष बन सकता है, तो यही सेवा आपके लिए भी बहुत कुछ कर सकती है। इसे आज़माएं।
गुड़गांव में गुरुदेव के खेत की देखभाल करने वाले पहलवान जी एक भक्त हैं। सीधे-सादे लेकिन पक्के वफ़ादार हैं। वह खेत में रहने वाले एक बंदर बजरंग की कहानी सुना रहे हैं।
गुरुदेव खेत पर बजरंग का साथ देने के लिए एक बंदरिया ले आए थे। उनका बच्चा मर गया था और गुरुदेव ने उसके लिए पाठ किया और सुनिश्चित किया कि बंदर का बच्चा अगले जन्म में मनुष्य रूप ले।
पहलवान जीः एक बार बजरंग नाम के एक बंदर के बच्चा की मौत हो गई। कुछ ही दिन हुए थे। अचानक गुरुदेव ने पूछा, "बजरंग कहां है?"किसी ने बताया "वह मर गया।" गुरुदेव ने कहा, "किसी ने मुझे बताया क्यों नहीं?"फिर गुरुदेव आधे घंटे के लिए अपना पाठ करने चले गए। आधे घंटे के बाद जब वह वापस आये तो घर बनाने वाले राम निवास ने उनसे पूछा,"आपने एक बंदर के लिए भी पाठ किया है?"गुरुदेव ने उत्तर दिया “हां बेटा। वह हमारे साथ रहता था,उसने हमारा मन बहलाया। वह हमें हंसाता था।" फिर उसने पूछा,"उसे कौन सा जन्म मिला?"गुरुदेव ने कहा,"अब उसने मानव रूप में जन्म लिया है। उसमें जो कुछ कमी थी, मैंने उसे उसके बच्चों की सेवा के साथ पूरी कर दी।”
बंदर से इंसान बनने का मतलब है कई योनियों या जीवन चक्रों को दरकिनार करना। मैं नहीं जानता कि जब यह बातचीत हुई तो डार्विन कहां थे?
बंदरों, कुत्तों और कुछ सांपों को मानव रूप में जन्म देना निश्चित रूप से प्रकृति की प्रक्रिया और मापदंडों की सीमा को पार करना है। लेकिन, मुझे लगता है कि संतों के मामलों में, प्रकृति ने कुछ छूट दे रखी है!
चार पैरों वाले प्राणियों के साथ बहुत सारे ‘होमोसैपियंस’ का रिश्ता और संचार-संवाद सहज नहीं रहा है। पर, गुरुदेव ने ऐसा संभव किया।
गिरि जी इस बात को और अच्छे से समझाते हैं
गिरी जीः मैंनेजानवरों से उनके लगाव को देखा है। एक बार वह मुझे फार्महाउस में ले गए। उन्हें गाय-भैंस पालने का भी शौक़ था।वह मुझे दिखाने ले गए। जैसे ही वह वहां पहुंचे, गाय-भैंसें शोर मचाने लगीं। और जब उन्होंने उन्हें चुप रहने को कहा तो वे चुप भी हो गईं। उन्होंने सभी के नाम रखे थे और जैसे ही उन्होंने पुकारा,"काली!",तो एक गाय ने अपना चेहरा घुमाया और रंभाने लगी।फिर उन्होंने पुकारा सरस्वती और बाईं ओर से एक गाय ने अपना चेहरा उनकी तरफ घुमाया और फिर उन्होंने सुंदरी कहकर तीसरी गाय को पुकारा। नाम पुकारने पर सभी गाएं उन्हें अपने ढंग से जवाब देती थीं। उनके पास धर्मेंद्र औररेखा नाम के बंदर भी थे। वह उनसे बातें करते थे और वह उनकी भाषा समझ भी सकते थे। उन्होंने हिरण भी पाले थे। फ़ार्महाउस सड़क से आधा किलोमीटर अंदर की ओर बना हुआ है। एक बार मुझे उन्होंने कहा कि मैं उनका वहां इंतज़ार करूं। लेकिन उनके पहुंचने से पहले ही सभी सेवादार जान गए कि गुरुजी आ गए हैं। ऐसा दूसरी बार हुआ। और तीन दिनों तक ऐसा होता रहा। अंत में, मैंने चौथे दिन उनसे पूछा, "गुरूजी 500 मीटर दूर गेट पर होते हैं और आप यहां कैसे जान जाते हैं कि वह आ रहे हैं?" उन्होंने बताया कि उन्हें नहीं पता चलता। जानवर इस बात को जान जाते हैं। गुरूजी के आने की आहट पाकर हिरण नाचने लगते हैं और गाय-भैंसें शोर मचाने लगती हैं। उन्हीं की वजह से हमें पता चलता है कि गुरु जी आ गए हैं। उन्हें आभास हो जाता है। तो यह दिखाता है कि गुरुजी का हर व्यक्ति ही नहीं, हर प्राणी, हर वस्तु के प्रति भी प्रेम था।
सेवा उनका तकिया-कलाम था यानी आदर्श था। वह इसमें पूरे मन से लगे रहे। उनका समय, शरीर, मन, सेवा के इर्द-गिर्द घूमता था। उन्होंने लोगों को भी दूसरों की सेवा करने के लिए प्रेरित किया, उनकी खुशामद की, यहां तक कि विनती भी की।
सेवा के मामले में गुरुदेव न केवल महानतम थे, बल्कि नवीनतम भी थे।
यदि हम सेवा के उनके रहस्य को नहीं सीखते हैं, तो हम जीवन-भर का एक अवसर खो देंगे। जिसके लिए हमें कई जन्मों तक पछतावा हो सकता है।
आइए, हम इस महान गुरु के अभिवादन के रूप में यथासंभव सर्वोत्तम सेवा करें।यह हमारी अपनी महान आत्मा का भी अभिवादन होगा। आइए सेवा में जुटें।
जो अपनी अलौकिक सिध्दियां दूसरों को सौंप देता है,उसे निश्चित रूप से कुछ उम्मीदें, अपेक्षाएं भी होती हैं। उन्होंने जिस सेवा की शुरुआत की, वह एक अकेले व्यक्ति का प्रयास था जिसमें कुछ लोगों ने उनकी मदद की। मुझे लगता है कि गुरुदेव की अपेक्षा यह होगी कि जिन लोगों को उन्होंने अपनी शक्ति दी हैवे और भी अधिक सेवा कर सकते हैं, और भी बहुत कुछ कर सकते हैं।
भूली बिसरी चंद उम्मीदें चंद फ़साने याद आए
भूली बिसरी चंद उम्मीदें चंद फ़साने याद आए
तुम याद आए और तुम्हारे साथ ज़माने याद आए।