The Guru of Gurus - Audio Biography
The Guru of Gurus - Audio Biography
असंभव भी संभव है!
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एक सामान्य व्यक्ति और एक असाधारण व्यक्ति के बीच का अंतर यह होता है कि सामान्य व्यक्ति ऐसे काम कर लेता है, जिन्हें ज्यादातर लोग थोड़ा-बहुत बेहतर कर सकते हैं। लेकिन, एक असाधारण व्यक्ति ऐसे कामों को अंजाम दे सकता है, जिन्हें अधिकतर लोग अतार्किक, अविश्वसनीय और असंभव मानते हैं, और इसलिए…
असंभव भी संभव है!
गुरुदेव ऑनलाइन गुरुओं के गुरु - महागुरु की ऑडियो बायोग्राफी प्रस्तुत करता है।
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आप गुरुदेव की जिंदगी और उनकी विचारधारा के बारे में इस वेबसाइट पर भी पढ़ सकते हैं - www.gurudevonline.com
एक सामान्य व्यक्ति और एक असाधारण व्यक्ति के बीच का अंतर यह होता है कि सामान्य व्यक्ति ऐसे काम कर लेता है, जिन्हें ज्यादातर लोग थोड़ा-बहुत बेहतर कर सकते हैं। लेकिन, एक असाधारण व्यक्ति ऐसे कामों को अंजाम दे सकता है, जिन्हें अधिकतर लोग अतार्किक, अविश्वसनीय और असंभव मानते हैं, और इसलिए…
असंभव भी संभव है!
गुरुदेव को महज एक हीलर यानी चिंताओं और परेशानियों को दूर करने वाले इंसान के रूप में देखना उनके क़द को कम करने के आंकने जैसा है। उनमें ऐसे-ऐसे कामों को कर दिखाने की शक्ति और क्षमता थी, जो अधिकांश लोगों के लिए असंभव हो सकते थे। यह क्षमता उनके भीतर स्वाभाविक रूप से आई। वह ऐसे उच्चतम लोक के प्राणी थे, जहां कुछ भी असंभव नहीं था।
महागुरु के रूप में उनका अवतार लेना, उनमें शिवालय नजर आना, ब्रह्मांडीय चेतना के साथ उनके जुड़ाव ने उन्हें उन सभी कामों को करने की क्षमता प्रदान की, जिसे अन्य लोग असंभव मानते थे।
लोगों का इलाज करने के अलावा, वह चीजों की प्रकृति को बदल सकते थे, तत्वों की संरचना में हेरफेर कर सकते थे और उपपरमाण्विक को नियंत्रित कर सकते थे। कुछ छोटे-छोटे उदाहरण सुनने लायक हैं। लेकिन याद रखें- एक के लिए जो चमत्कार है, वह दूसरे के लिए सामान्य कार्य हो सकता है।
उनकी अलौकिक क्षमता का एक दूसरा पहलू यह भी था कि वह सूक्ष्म यात्रा कर सकते थे। उनमें दूसरे लोक की यात्रा कर पाने की असाधारण क्षमता थी।
वह लौकिक और पारलौकिक - दोनों लोक में रहते थे। उन्होंने सूक्ष्म यात्रा को 'पाठ' का नाम दिया और लगभग हर दिन कुछ घंटों तक इसका अभ्यास करते थे। उनकी चेतना इस भौतिक लोक से पारलौकिक दुनिया में स्थानांतरित हो जाती थी। सूक्ष्म यात्रा करना उनके लिए आसान बात थी।
अपने भौतिक शरीर से बाहर निकलकर दूसरे लोक की यात्रा करते हुए वह दुनिया-भर में स्थापित विभिन्न स्थानों पर पहुंचने वाले लोगों पर नज़र रखते थे, उनकी ज़रूरतों का जायज़ा लेते थे और फिर इस दुनिया में वापस आ जाते थे। साथ ही, गुरु नानक, गुरु अंगद, शिरडी के साईं जैसी आध्यात्मिक शक्तियों के साथ उनकी नियमित रूप से सूक्ष्म बैठकें होती थीं। परशुराम जी और अन्य देवी-देवताओं के साथ उनकी मुलाक़ात किसी खास मक़सद से होती थी। मैं इसे सूक्ष्म सामाजीकरण कहता हूं!
पाठ का एक मक़सद यह भी होता था कि इस दौरान वह कुछ मामलों में लोगों के जीवन की आर्थिक और सामाजिक-पारिवारिक समस्याओं को हल करने के लिए कुछ घटनाओं को नए सिरे से व्यवस्थित कर सकें।
गुरुदेव की पत्नी, जिन्हें हम अपनी आध्यात्मिक मां मानते हैं और 'माताजी' कहते हैं, उनके जीवन में उनके लिए एक बड़ा सहारा थीं। गुरुदेव साल के लगभग आधे दिन विभिन्न कैंप के प्रवास पर रहते थे, ऐसे में प्रवास के दिनों में घर, परिवार, घर में बने मंदिर की देखभाल का ज़िम्मा माताजी पर होता था।
ज़रूरत पड़ने पर उन्हें पाठ से जगाने का काम भी माताजी का ही था। आइए, उनसे बात करते हैं।
माताजीः वह कहा करते थे,"जब दुनिया रात को सोती है,मैं जागता रहता हूं। लोग कहते हैं कि मैं सोता हूं,लेकिन वे नहीं जानते कि हम सब काम कर रहे होते हैं।"
सवालःइससे उनका क्या मतलब था?
माताजीः वह कहते थे कि मैं ही सब कुछ हूं। । मैं जानता हूं कि मेरे शिष्य क्या करते हैं, वे कहां जाते हैं, लेकिन यह कोई नहीं जान सकता कि मैं कहां जाता हूं। मेरे बारे में कोई, कुछ नहीं जान सकता।
सवालःआपके कहने का मतलब है कि वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकल जाते थे ?
माताजीः जी, हां।
सवालःक्या ऐसा लगता था कि वह सामान्य ढंग से सो रहे हैं या कोई अंतर नजर आता था?
माताजीःनहीं, ऐसा लगता था कि वह सामान्य ढंग से सो रहे हैं। ज़रा भी अंतर नहीं मालूम पड़ता था। कभी-कभी, जब उनके दोस्त आते और उन्हें जगाने की कोशिश करते तो गुरुजी नाराज़ हो जाते थे। उस समय तक वे लोग केवल उनके दोस्त थे, बाद में शिष्य बन गए थे। उनके जगाने पर गुरुजी कहते कि तुम लोग मुझे मत जगाया करो, माताजी से कहा करो। कभी-कभी, जब मैं उन्हें जगाती, उनके पैरों को हिलाती, तो वह तुरंत जागते नहीं थे। हो सकता है कि वह बहुत दूर की यात्रा पर निकल जाते हों और तुरंत वापस आना संभव न होता हो। वह कहा करते थे, "मैं जहां जाता हूं, वहां से वापस आने में कभी-कभी मुझे एक, दो या तीन मिनट का समय लग जाता है।" इसलिए जब भी जागने में समय लगता था, मैं उन्हें छोड़ देती थी।
माताजी ने एक ऐसे व्यक्ति से विवाह किया था जो लगभग हर दिन अपना शरीर छोड़ कर दूसरी यात्रा पर निकल जाते थे। इसके अलावा, उन्हें यह भी सीखना पड़ा कि ज़रूरत पड़ने पर गुरुदेव को उनकी पारलौकिक यात्राओं से कैसे वापस बुलाया जाए। गुरुदेव कहते थे, “जब लोग सोते हैं, तो मैं ब्रह्मांड की यात्रा करता हूं। किसी को पता नहीं चल सकता कि मैं कहां जाता हूं, परन्तु मैं लोगों पर नज़र रखता हूं और उनका मार्गदर्शन करता हूं।”
गुरुदेव अपने शरीर से निकलकर पारलौकिक यात्रा पर जाने का अभ्यास करते थे और हमें भी एकाध बार उनके साथ सूक्ष्म सफ़र पर जाने का मौका मिला, लेकिन हम उड़ान में सवार होना ही भूल गए।
राजपाल जी ने गुरुदेव की इस सूक्ष्म यात्रा की एक अजीब कहानी साझा की।
राजपाल जीःहोशियारपुर की बात है। गुरुजी जब मिलने वालों से फ्री हुए तोसीताराम जी,सुरेश,आरपी शर्मा और मैं-उस कमरे में गए, जहां वह बैठे थे। वह एक छोटा कमरा था और गुरुजी कुछ कह रहे थे और हम सब ध्यान से सुन रहे थे। सुबह के लगभग 2.00 बजे,गुरुजी ने हमें भोजन लाने के लिए कहा। बाहर कुछ सेवादार थे, वे खाना लेकर आ गए। मक्के की रोटी और घी था-गुरुजी ने हम सभी को सरसों का साग दिया, उसमें थोड़ा घी डालाऔर ख़ुद भी खाना शुरू कर दिया और हमें भी परोसा। भोजन करते समय गुरुजी के हाथ से अचानक चम्मच छूट गया।
मैं उन्हें देखकर चिंतित हो गया। सीताराम और आरपी शर्मा भी परेशान हो गए। वह सांस नहीं ले रहे थे। उनकी धड़कन रुक गई थी। नब्ज़ बंद थी। आंखें भी बंद थीं। हमें लगा कि उनका निधन हो गया है। हमने घी लिया और उनके हाथ, पैर और खोपड़ी पर मलने लगे। हमने उनके शरीर पर ढेर सारा घी लगा दिया। पांच मिनट के बाद सीताराम जी ने मेरा नाम लेते हुए कहा, "राजपाल, समय क्या हुआ है?" मैंने बताया कि 2.20 बजे हैं। उन्होंने कहा कि हमें घी मलते हुए पांच मिनट हो गए हैं। गुरुजी ने हमें बताया था कि उनका समय 2:15 पर शुरू होता है और 3:30 बजे तक चलता है। ऐसा ही कुछ हुआ होगा। हमें 3:30 बजे तक प्रतीक्षा करनी होगी। चिंता की कोई बात नहीं। हमने अपना-अपना खाना थाली में छोड़ दिया। आरपी शर्मा, सीताराम जी, सुनीत, सुरेश और मैं-हम सब 3:30 बजे तक चुपचाप बैठे रहे। जब मेरी घड़ी में 3:30 बज गए तो मैंने सीताराम जी की ओर देखा। वह गहरे विचार में खोए थे। फिर उन्होंने गुरुजी की घड़ी की ओर देखा, और उसमें 3:30 बजने के 2 मिनट बाक़ी थे। जैसे ही उनकी घड़ी के 3:30 बजे, गुरुजी ने एक गहरा ओम बोला और उठ खड़े हुए। उन्होंने मेरी या किसी और की तरफ़ नहीं देखा, कुंडी खोली और बाहर निकल गए। हम अंत में सो गए। सुबह 6:30 बजे गुरुजी नाराज़ होकर हमारे पास आए और बोले, "तुमने क्या सोचा था कि तुम्हारा गुरु मर गया है? मैंने तुम सभी को बताया है कि गुरु के पीछे-पीछे कैसे चलना है। मेरे पैर तुम्हारे हाथों में थे। यदि तुम उसे दबाकर पकड़ लेते तो मेरे पीछे आ सकते थे।" मैंने कहा कि मुझे यह बात याद नहीं थी। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए था क्योंकि हम यह सोचकर डर गए थे कि गुरु की मृत्यु हो गई है। मैंने उनसे माफ़ी मांगी।
शिकागो के एक शिष्य सुरेंद्र कौशल को गुरुदेव के साथ सूक्ष्म यात्रा पर जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने सभी ग्रहों को क़रीब से देखा। खास बात तो यह थी कि गुरुदेव ने उन्हें शक्तिशाली शनि का स्पर्श भी कराया।
ग्रह-नक्षत्रों के साथ व्यवहार करने के बावजूद, गुरुदेव कभी ज्योतिषी नहीं बने। मुझे लगता है कि नियति ने उनके लिए इससे भी बड़ा काम निर्धारित कर रखा था।
संतलाल जी कुछ ऐसे ही सूक्ष्म रहस्य को साझा कर रहे हैं। बहुत से लोगों को यह मालूम नहीं होगा।
यह कहानी कुछ ऐसी थी कि गुरुदेव ने एक कैंप के दौरान अपने तीन शिष्यों को उनके शरीर से बाहर निकाल कर अपने-अपने घरो में भेजा था। बेशक, कुछ प्रतिबंध अवश्य लगाए थे।
सवालःजब-जब गुरुजी अपने शरीर से बाहर निकलकर पारलौकिक यात्रा पर गए, तो क्या उनके साथ आपने वह अनुभव हासिल किया? क्या आप अपने अनुभव हमारे साथ साझा कर सकते हैं?
संतलाल जीः मेरेएक गुरु भाई बख्शी जी और मैं गुरुजी के साथ हिमाचल के दौरे पर गए थे। वहां उन्होंने हमें अपने सिर के बगल में थोड़ा पानी रखने,धूप जलाने और लेटने के लिए कहा। वह हमारी आत्माओं को सूक्ष्म यात्रा पर ले जाने और फिर वापस लाने वाले थे। एक बात जो वह हमें हमेशा याद दिलाते थे, वह यह थी तेज़ चमकदार प्रकाश पर नज़र रखना है और उसकी ओर बढ़ना।
सवालःकिस प्रकार का प्रकाश?
संतलाल जीः यह प्रकाश पीलापन लिए होता है, लेकिन वह श्वेत प्रकाश कहते थे।
सवालःतो, उन्होंने कहा कि जब पारलौकिक यात्रा पर हों और नीचे सफ़ेद प्रकाश देखें तो वहीं ठहर जाएं?
संतलाल जीः तो, हम तीनों वहां थे। तीसरे व्यक्ति थे अमीचंद। शिमला के बख्शी जी थे जो वहां सेवा करते थे, कांगड़ा जिले के अमीचंद और मैं। वह हम तीनों को अपने-अपने शरीर से बाहर निकालकर अपने साथ ले गए। हमें अपने-अपने स्थानों पर जाकर प्रार्थना करनी थी। उन्होंने हमें स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि हम अपने परिवार के किसी भी सदस्य-पत्नी, बच्चों से न मिलें, और नाही उनसे बात करें, चाहे कुछ भी हो जाए। हमें अपने घरों में पानी तक भी नहीं पीना था।
सवालःकहां? पानी कहां नहीं पीना था?
संतलाल जीः अपने घर में।
सवालःओह, तो जब आप अपनी आत्मा के रूप में थे तो निर्देश मिला था कि पानी नहीं पीना है या अपनी पत्नी से नहीं मिलना है?
संतलाल जीः हां। मेरे बच्चे छोटे थे। मैंने अपनी पत्नी को पुकार कर कहा, "मैडम।" उसने जवाब दिया "हां,बोलो।" तब मुझे एहसास हुआ कि गुरुजी ने मुझसे क्या कहा था कि बात मत करना और मैंने ग़लती से अपनी पत्नी से बात कर ली। जैसे ही मैं घर पहुंचा,मैं अपने बच्चों का हालचाल जानना चाहता था। बाद मेंमुझे याद आया कि गुरुजी ने उनसे न मिलने के लिए कहा था। तो,मैं चुप रहा। इस यात्रा के बाद हम वापस अपने-अपने भौतिक शरीरों में लौट आए। अमीचंद जी अभी तक नहीं लौटे थे क्योंकि वे रास्ते में भटक गए थे, जबकि बख्शी जी और मैं लौट आए थे। गुरुदेव की कृपा से ही हम जान पाए कि शरीर को कैसे छोड़ना है,कैसे वापस आना है।
अच्छी ख़बर यह थी कि रास्ते में भटक गए कोटला के अमीचंद जी की आख़िरकार गुरुदेव से मुलाक़ात हो गई। अमीचंद जी को उनके अपने शरीर में वापस लाने के लिए गुरुदेव को सूक्ष्म यात्रा करनी पड़ी।
एक और यात्रा वर्णन सुना रहे हैं संतोष जी। वह गुरुदेव के शिष्य हैं जो नादौन में स्थान चलाते हैं। चूंकि यह साक्षात्कार सैर करते हुए लिया गया था, आशा है कि आप हवा के साथ-साथ पत्तों की सरसराहट का आनंद उठा पाएंगे।
संतोष जीः घटना गुड़गांव की है।गुरुजी ऑफ़िस के लिए निकल गए थे। मैं गुरुदेव के साथ रह रहा था। उनके पड़ोसी उमाशंकर जी का घर बन रहा था। निर्माण सामग्री उनके पिछवाड़े में रखी हुई थी। गुरुजी के आने का इंतज़ार करते हुए मैं वहां रखी हुई ईंटों के ढेर पर लेट गया। गुरुजी जब लौटे तो उन्होंने मुझसे पूछा, तुम किस यात्रा पर गए थे। मैं तो तभी बता पाता, जब मुझे स्वयं इसका जवाब मालूम होता। इस सांसारिक धरातल पर मैं किस स्थान पर था, ये तो गुरुजी ही जानते थे। अगले एक-दो घंटों तकगुरुजी मुझे कई जगहों पर ले गए-पहाड़ों के बीच, इधर-उधर। मैं यात्रा के दौरान उनसे कहता था, "गुरुजी, मेरा यह मानना है।" वह कहते "ठीक है।" और आगे अगर मैं किसी खास बात के बारे में पूछूं तो वह फिर से जवाब देते,"नहीं बेटा, यह ठीक है।" दो-ढाई घंटे तक ऐसा ही चलता रहा। सच कहूं तो मैं पूरी तरह से संतुष्ट था। जब मैं आख़िरकार उठा,तो मुझे बहुत ताज़गी का एहसास हुआ।
गुरुदेव राजी शर्मा को ऐसी ही एक सूक्ष्म यात्रा पर ले गए जहां राजी का परिचय महान शंकर से हुआ। एक अन्य परम उत्साही शिष्य पंचू सेठी को तीन भव्य देवियों - पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के दर्शन हुए थे।
यदि इन सभी अनुभवों का दस्तावेज़ तैयार किया जाए, तो एक छोटी-मोटी एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका तैयार हो जाएगी। तो आइए, कहानियों को थोड़ा छोटा ही रखते हैं।
देवताओं की ही बात को जारी रखते हुए एक और शिष्य, रवि त्रेहन जी के साथ सफर पर चलें, जो गुरुदेव के साथ उच्चतम लोकों में से एक, गुरुलोक में गए थे।
रवि जीः मैं इस बात को सौ फ़ीसदी भरोसे के साथ तो नहीं कह सकता, क्योंकि मेरे पास पुख्ता सबूत नहीं हैं, लेकिन मुझे ऐसा आभास हुआ कि मैं गुरुलोक में था।
सवालःकब?
रवि जीः गुरुदेव मुझे अपने साथ ले गए थे। मैंने वहां जिनको देखा, उनमें से किसी को पहचानने की स्थिति में नहीं था लेकिन मैंने महसूस किया कि प्राचीन काल के सभी महागुरु वहां मौजूद थे। उन सभी पवित्र आत्माओं के चेहरे वैसे ही थे जैसे हम तस्वीरों में देखते हैं, लंबे बाल और लंबी दाढ़ी। वे सभी एक विशिष्ट तरह की पोशाक में थे। एक सजा हुआ दरबार था जहां विश्वामित्र जी थे और महर्षि वशिष्ठ भी थे।
गुरुदेव की वास्तविकता का बोध दूसरों से काफी अलग था। वह न केवल अपनी इच्छानुसार यात्रा करना जानते थे, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दूसरों की सहायता भी कर सकते थे। शिष्यों और भक्तों के ऐसे अनेक अनुभव हैं जिनमें उन्होंने ख़ुद को अपने शरीर से बाहर निकला हुआ पाया। ऐसा या तो किसी ख़ास उद्देश्य से हुआ या फिर एक अलग वास्तविकता का अनुभव करने के लिए हुआ।
मैं ऐसी कुछ यात्राओं का गवाह हूं जहां वह मुझे उच्च लोक की यात्रा पर ले गए और फिर उन्होंने मुझे व्यक्तिगत यात्रा का अनुभव लेने के लिए अकेला छोड़ दिया। लेकिन इसके बाद उन्होंने ऐसा करना बंद कर दिया। उनको एहसास हुआ कि इस तरह यात्रा करवाना ख़तरनाक हो सकता है। जब कोई व्यक्ति अपना शरीर छोड़कर बाहर निकलता है, तो किसी दूसरी शक्तिशाली आत्मा द्वारा उस पर कब्ज़ा किए जाने का ख़तरा बना रहता है।
आइए, आगे बढ़ते हैं !
कानपुर स्थान की गुड्डन जी ने अपनी दम तोड़ती हुई मां को देखने के लिए शरीर से बाहर निकलने के अनुभव की अपनी कहानी सुनाई।
गुड्डन जीः मेरी मां कानपुर में मृत्यु शैय्या पर थीं और मैं गुरुजी के साथ पांचमहीनों से गुड़गांव में रह रही थी। गुरुजी ने मुझे मेरे परिवार से दूर रखा था, पता नहीं क्यों। उनसे कारण पूछने की मेरी हिम्मत नहीं थी। उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया कि मेरी मां की हालत कैसी है, और दूसरों को भी बताने से मना किया था। आप इसे क्या कहेंगे, मैं नहीं जानती पर, मां की मृत्यु के 2-3 दिन पहले मैं सो रही था और अपनी नींद मेंमैंने देखा कि मैं अपने शरीर से बाहर निकलकर उड़ते हुए कानपुर में अपनी मां से मिलने पहुंच गई। मैंने उसे देख लिया, लेकिन छुआ नहीं। मुझे यह भी पता था कि मुझे वापस गुड़गांव जाना है। इसलिए, मैं मां को देखकर तुरंत वापस गुड़गांव की ओर उड़ने लगी। क्योंकि मुझे डर था कि गुरुजी ने मुझे एक निश्चित समय सीमा दी थी,उस समय मुझे वापस पहुंचना था। जब मैं उठी तो मुझे लगा कि यह सब सपना था। फिर जब मेरी मां की मृत्यु हो गई,मैं गुरुजी से मिलने गई। उस समय वह राजपाल जी के यहां ठहरे हुए थे। मैंने गुरुजी से कहा, "गुरुजी,मुझे अपनी मां से मिलने का भी मौका नहीं मिला।" उन्होंने कहा, "किसने कहा कि तुम अपनी मां से नहीं मिली?तुम उनसे मिलने गई थी। मैंने तुम्हें भेजा था।" और उन्होंने मुझे याद दिलाया कि कैसे मैं उनकी मृत्यु से पहले मां से मिलने गयी थी। यहां तक कि मेरे भाई ने भी कहा कि जब मैं वहां थी उस समय मेरी मां ने कहा, "गुड्डन आ गई।" मतलब मां ने मुझे आते देखा। यह सब गुरुजी के आशीर्वाद से ही हुआ था। हम इसे एक सपना मानते हैं, लेकिन वह इसे कैसे करते थे, यह वह ही जानें।
गुरुदेव को बिना किसी पूर्व चेतावनी के तुरंत अपने शरीर से बाहर निकलते देखना उनके शिष्यों के लिए आम बात थी। इससे उनके आस-पास के लोग हैरान रह जाते थे। ऐसी ही एक कहानी मुझे उनके एक शिष्य स्वर्गीय सीताराम टक्की जी ने सुनाई। टक्की जी, गुरुदेव के गुरू नहीं थे। आप सीताराम नाम से भ्रमित मत होइएगा।
दरअसल, गुरुदेव के जीवन में सीताराम जी नाम के चार व्यक्ति थे-
दो सीताराम जी वे जिन्होंने उनका मार्गदर्शन किया - बनारस के सीताराम जी और दसुआ के सीताराम जी।
एक सीतारामजी वह, जिनका उन्होंने मार्गदर्शन किया। उनकी ही कहानी हम साझा करने जा रहे हैं।
और चौथा वह जोड़ा, जिनका उन्होंने मुझे मानसिक प्रतिबिंब दिखाया था – पवित्र रामायण के प्रसिद्ध पात्र सीता और भगवान राम।
चलिए, आगे बढ़ते हैं।
गुरुदेव ने सूक्ष्म यात्रा के दौरान अपना शरीर छोड़ते समय सीताराम टक्की जी से कहा कि वह उनके पैरों को पकड़ लें और उनके साथ आकाशगंगा की यात्रा पर चलें।
सीताराम जी ने देखा कि गुरुदेव की छाया-छवि उनकी निद्रावस्था से उठ रही है। उस क्षण सीताराम जी ने घबराकर गुरुदेव के पैरों को छोड़ दिया और उन्होंने गुरुदेव की छायाछवि को खिड़की से बाहर जाते हुए देखा। घंटों बाद गुरुदेव की छायाछवि की वापसी हुई।
गुड़गांव में मुझे भी ऐसा ही अनुभव हुआ था। वह पाठ करने जा रहे थे और अपना शरीर छोड़ते समय मुझे अपने पैरों को पकड़ने के लिए कहा। वह मुझे ग्रहों और अंतरिक्ष की यात्रा पर ले जाना चाहते थे। मैंने उनकी आत्मा को शरीर छोड़ते हुए तो नहीं देखा, लेकिन जैसे ही उनके शरीर में हलचल होने लगी, मैं घबरा गया और मैंने उनके पैरों को छोड़ दिया।
गुरुदेव की अलौकिक शक्ति के कई पहलू थे और इनमें से शरीर के बाहर निकलने का अनुभव सबसे महत्वपूर्ण था। दूसरी क्षमता थी लोगों को उनके सपने में मार्गदर्शन करना। तीसरी थी एक साथ दो जगहों पर मौजूदगी। और चौथी, अपने आप के साथ-साथ तमाम चीज़ों को भौतिक और अभौतिक बनाने की क्षमता। उपचार, अदृश्यता, शारीरिक अस्वस्थता को ठीक करना, रूप बदलने की क्षमता - सूची लंबी है।
प्रकृति के तत्वों पर उनका नियंत्रण पाना एक बहुत ही अनोखी क्षमता थी।
परवाणू स्थान के गुप्ता जी ने गुरुदेव को एक और असंभव कार्य करते देखा था। वह यहां अपना अनुभव साझा कर रहे हैं।
खीर और गुलाब जामुन का सिर्फ एक डिब्बा कई-कई आगंतुकों को खिलाने के लिए पर्याप्त होता था।
गुप्ता जीः एक बार ऐसा हुआ कि गुरुदेव शिलाई क्षेत्र में रहने के लिए आए।
सवालःकहां?
गुप्ता जीः शिलाई, पोंटा साहिब के पास। हम भी वहां गए थे। गुरुदेव को गुड़गांव से कुछ खीर मिली थी,जिसे कार की डिक्की में रखा गया था। गर्मी का समय था,इसलिए गुरुदेव ने हमें वहां मौजूद सभी लोगों को खीर बांट देने के लिए कहा। गुरुदेव को वहीं से गुलाब जामुन का एक डिब्बा भी मिला था। बाहर बहुत सारे लोग थे। तो,हमने सोचा कि खीर और गुलाब जामुन सभी के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। लेकिन, सभी को बड़े चम्मच से परोसने के बावजूद न तो खीर खत्म हुई और न ही गुलाब जामुन। आप गुरुदेव को 'अन्नपूर्णा'कह सकते हैं।
अन्नपूर्णा की शक्ति यह है कि भोजन कभी कम नहीं पड़ता। थोड़ा भी हो, तो अनेक लोगों को बांटा जा सकता है। असंभव भी संभव है!
परवेश कपूर, जो गुरुदेव के साथ भारत भर में कई यात्राओं पर गए, 'चिरस्थायी'अध्यात्मवाद की एक दिलचस्प कहानी सुना रहे हैं। याद रखें कि जब आपका तत्वों और पदार्थों पर नियंत्रण होता है, तो आपके द्वारा किए गए कार्य लोगों को अतार्किक लग सकते हैं क्योंकि तब असंभव भी साध्य यानी संभव हो जाता है।
परवेश कपूरः एक बार गाड़ी का पेट्रोल खत्म हो गया। उन्होंने मुझसे कहा, "बेटा,पेट्रोल की टंकी खोलो"। मैंने टंकी खोली और फिर उन्होंने मुझे ढक्कन बंद करने को कहा। उन्होंने हमें गाड़ी स्टार्ट करने को कहा। हमने गाड़ी स्टार्ट की और चल पड़े। और उसके बाद हम पेट्रोल के लिए कहीं नहीं रुके। वापस दिल्ली पहुंचने के बाद ही हमने पेट्रोल लिया।
सवालःऔर पेट्रोल के बिना आपने कितने किलोमीटर का सफ़र तय किया?
परवेश कपूरः कम से कम 80-85किलोमीटर।
बातचीत करने के लिए गुरुदेव की बहनें वापस आ गई हैं, आश्चर्यजनक बातों का पुलिंदा लेकर।
प्रत्येक शिवरात्रि को गुरुदेव उबलती हुई नींबू की चाय में कुछ सेकंड तक अपने हाथों को डूबाते ताकी अपनी आभामण्डल से उसे ज़्यादा अर्जित कर सके। उनके हाथ भी नहीं जलते थे। विश्वास करना मुश्किल था।
गुरुदेव की बहनः मैंने वहां लोगों से पूछा, "वहां कौन लोग हैं?"वहां पांच-छह शिष्य थे, जो जल बना रहे थे। उन्होंने बताया, "वे लेमन टी बनाते हैं।" मैंने कहा "वे लेमन टी क्यों बांटते हैं?" उन्होंने कहा, "उस लेमन टी में भी करामात (जादू) है"। मैंने उनसे पूछा कैसे। उन्होंने कहा,"गुरुजी चाय के अंदर अपना हाथ डालते हैं"। मैंने कहा "मुझे विश्वास नहीं हो रहा है। वह चाय के अंदर अपना हाथ कैसे डाल सकते हैं? इससे तो छाले पड़ जाएंगे।" उन्होंने कहा, "आप इसे अपनी आंखों से देख सकती हैं।" फिर मैंने कहा,"मैं तभी विश्वास करूंगी जब मैं इसे अपनी आंखों से देखूंगी।"
सवालःयह आपकी आंखों के सामने हुआ?
गुरुदेव की बहनः हां। मैंने यह सब बख्शी जी से सुना था। मुझे बताया गया कि पांच शिष्य जल तैयार कर रहे हैं। मैं देखने के लिए गई। चाय को उबालने के लिए चूल्हे पर रखा गया था। फिर गुरुजी ने उसमें अपने दोनों हाथ डाले। मैंने कहा,तो यह भी किया जा सकता है। तीसरी बार जब गुरूजी ने उबलते हुए चाय में हाथ बहुत गहरे डाले तो मैं डर गयी। मैंने डीएसपी की पत्नी से कहा कि "भाभी जी,कृपया देखिए गुरुजी ने चाय में हाथ डाल दिए हैं"।
जब आप ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ते हैं तो आप अपने भौतिक अस्तित्व से बहुत आगे निकल जाते हैं। आप हर चीज़ का हिस्सा बन जाते हैं,सब कुछ आपका हिस्सा बन जाता है। सभी जीवन रूप,तत्व,ब्रह्मांडीय किरणें आपके साथ तालमेल बिठाने लगते हैं। आपकी पहचान एक व्यक्ति 'मैं' से बढ़कर सर्वोच्च 'मैं' तक फैल जाती है।
कई महान ऋषि अस्तित्व के इस स्तर तक पहुंच चुके हैं। गुरुदेव भी उच्च शिखर तक पहुंच गए थे।
कई अवसरों परउन्हें प्रकृति में बदलाव करना पड़ा, जानवरों और पक्षियों के साथ संवाद किया, प्रतीक्षारत आत्माओं को जन्म दिया, ग्रहों की किरणों को बेअसर किया और कई जीवन को विस्तार दिया।
उनके जीवन की शुरुआत एक चमत्कार से हुई। जिस दिन वह पैदा हुए थे, उस दिन अचानक बारिश हुई थी। उनका नाम 'संतप्रकाश' रखा जाना था,लेकिन बेमौसम बारिश के कारण उनकी दादी ने उनका नाम 'राजिंदर' रखा, जिसका अर्थ है बारिश और प्राकृतिक तत्वों का शासक। उन्हें न केवल बारिश को रोकना और गिराना आता था, बल्कि अन्य तत्वों को भी वह नियंत्रित कर सकते थे और विशेष मामलों में जीवन को विस्तार भी दे सकते थे।
उनका जन्म एक चमत्कार था। उनका जीवन भी किसी चमत्कार से कम नहीं था। और उनके निधन के बाद भी उन्होंने लोगों को अपने दर्शन देकर कई चमत्कार किए।
परवाणू के गुप्ता जी एक बहुत अच्छी कहानी सुना रहे हैं
गुप्ता जीः नारकंडा में एक जगह ओडी है। यह एक पहाड़ी इलाक़ा है। बहुत तेज़ बारिश हो रही थी, बादल छाए हुए थेऔर ओले भी पड़े थे। शिमला में सेवा कर चुके सज्जन ठुकराल और अन्य लोग भी वहां मौजूद थे। उन्होंने मुझे बताया कि जब गुरुदेव बाहर निकले और बोले,"अबबस, बहुत हुआ,"और देखते ही देखते बारिश बंद हो गई।
सवालः"अब बस, बहुत हुआ," उन्होंने किससे कहा?
गुप्ता जीः प्रकृति से...उन्होंने किसी से बात की होगी।
सवालःफिर बारिश कब रुकी?
गुप्ता जीः उनके ऐसा कहते ही बारिश रुक गई थी।
सवालःइतनी जल्दी?
गुप्ता जीः हां।
बलजीत जी को गुरुदेव की भक्ति और निष्ठा का माउंट एवरेस्ट कह सकते हैं। नज़फ़गढ़ और सेक्टर 10के निर्माण कार्य में उन्होंने जो प्रयास किए और जो योगदान दिया है, वह उनके गुरु के उद्देश्य और मिशन के प्रति समर्पण का उदाहरण है। एक दिलचस्प कहानी आ रही है बारिश की।
बलजीत जीः यह बात 1989 की है। '89में सेक्टर 10में निर्माण कार्य शुरू हो गया था। यह समय जून या जुलाई का था। हम बेसमेंट की खुदाई कर रहे थे और मैं परेशान था कि कहीं बारिश हो गई तो हम सब बेसमेंट में फंसकर रह जाएंगे। तो गुरुजी पीछे से आए और पूछा, "तुम क्या सोच रहे हो?"मैंने कहा "गुरुजी,हमें 8 से 10 दिन और दीजिए क्योंकि अगर बारिश हुई तो हमारे लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा।" फिर ऐसा हुआ कि उन दिनों बारिश नहीं हुई और हम उस बेसमेंट का लिंटर बनाने की स्थिति में पहुंच गए। उन दिनों केवल सेक्टर 10 के प्लॉट पर बारिश नहीं हो रही थी,जबकि पूरे गुड़गांव में पानी बरस रहा था। गुरुजी ने आकर कहा, "देखो।" मैंने हाथ जोड़ लिये। उन्होंने कहा,"बेटा,बारिश रोकना और बारिश करवाना मेरे लिए एक छोटी सी बात है।" उन्होंने मुझसे कहा कि वह सब कुछ कर सकते हैं।
हम, महाराष्ट्र के लोगों के लिए इस अवधारणा को पचाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, क्योंकि हम "ये रे, ये रे पावसा, तुला देतो पैसा, पैसा झाला खोटा, पाउस आला मोठा" गाकर बारिश को बुलाने के आदी हैं।
और यहां,वह पूरी अवधारणा को उलट रहे थे।
गुरुदेव ने मुझे मुंगावली में उनके कैंप में उनके साथ कुछ दिन बिताने के लिए कहा था। वहां हम तंबू में रह रहे थे। एक शाम बारिश शुरू हो गई। गुरुदेव बाहर गए,चारों ओर देखा और वापस आ गए, लेकिन बारिश नहीं रुकी। उल्टा,बारिश और तेज़ हो गई। उनके चेहरे के भाव बदल गए और कुछ सेकंड के बाद उन्होंने टेंट का फ्लैप खोला,ऊपर की ओर देखा और चिल्लाये, जिसके बाद मैंने पानी को ऊपर की ओर जाते देखा और आधे सेकेंड से भी कम समय में बारिश बंद हो गई। मैं बहुत स्तब्ध था;पूरी शाम मैं उनसे बात नहीं कर सका।
गुरुदेव की भाभी को हम प्यार से चाची कहते थे। उनका विवाह गुरुदेव के छोटे भाई सतीश जी से हुआ था।उन्हें हम चाचाजी कहते थे। सभी उनसे बहुत प्यार करते थे और वह बड़ा दिल लगाकर सेवा करते थे। चाचीजी अपने परिवार के साथ हरियाणा में गुरुदेव के पुश्तैनी घर में रहती हैं जहान वो सेवा करती हैं और अपने निवास के पास बने शीतला देवी मंदिर की रखवाली भी करती हैं। वह अपना अनुभव बता रही हैं।
सवालःक्या आपने गुरुदेव को बाढ़-तूफ़ान रोकते हुए देखा है?
चाची जीः हां,मैंने देखा है। मैंने इसे तब देखा था जब 1988 मेंमेरे पति ने अपने भौतिक शरीर को छोड़ा। उस समय हर जगह भारी बारिश हो रही थी,बाढ़ आ गई थी। पंजाब पूरी तरह डूब गया था और उन्होंने जो शीतला मंदिर बनाया था,पानी मंदिर के गेट को छूकर लौट गया। गुरुदेव ने कहा कि डरने की कोई बात नहीं है। सबकुछ शांत हो जाएगा। हम जब शव को लेकर लौटे तो गुरुदेव शीतला मंदिर में थे। उसके बाद गुरुदेव आए और बाढ़ का पानी गुरुदेव के चरणों को स्पर्श करते ही उतर गया। लोगों ने ऐसी बातें सुनी होंगी, लेकिन मैंने प्रत्यक्ष देखा है।
संतलाल जी ने मुझे बताया कि वह एक बार गुरुदेव के साथ जुहू समुद्रतट पर गए थे।वह यह देखकर चकित रह गए कि प्रकृति महागुरु के साथ कैसा बर्ताव करती थी। उन्होंने देखा कि समुद्र की लहरें आईं और गुरुदेव के पैर सहलाकर लौट गईं।
लेकिन, सुनकर नहीं प्रत्यक्ष देखने के बाद ही विश्वास होता है। जुहू बीच पर जो मैंने देखा वह कुछ ऐसा ही था। हम जिस जगह पर खड़े होकर क्षितिज को निहार रहे थे,वहां से लहरें कम से कम 30 फीट की दूरी पर थीं। अचानक एक उत्साह से भरी हुई लहर आई और गुरुदेव की चप्पलों को छूकर लौट गई। उसने केवल गुरुदेव की चप्पलों को स्पर्श किया, बाकी किसी की नहीं।
मुझे लगता है कि यह नस्लीय भेदभाव का नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मामला था!
अनुभव सुनाने के मामले में गिरि जी भी पीछे नहीं रहना चाहते हैं। चेन्नई के एक समुद्र तट पर गुरुदेव के साथ घटी ऐसी ही घटना का अनुभव उन्होंने भी साझा किया। हम बच्चे होते तो कहते, "सेम टू सेम"!
आप किसी के 20 सालों के जीवन के दैनिक चमत्कारों को60मिनट में नहीं लिख सकते। न ही आप कुछेक पॉडकास्ट में दस लाख से अधिक चमत्कारों को रिकॉर्ड कर सकते हैं। ये अंश केवल नमूना हैं और आपको गुरुदेव के अस्तित्व की एक झलक दिखाते हैं।
असंभव को संभव बनाना हो तो अपने दुःख-संताप को हंसते-खेलते दूर भगाना सीखें।
गुरुदेव के जीवन से प्रेरणा लेकर आप जो हैं, उसे स्वीकार करना सीखें। ईश्वर आपके आसपास, चारों ओर विराजमान है।
अपना ज़माना आप बनाते हैं अहले दिल
अपना ज़माना आप बनाते हैं अहले दिल,
हम वो नहीं जिन्हें ज़माना बना गया
हम वो नहीं जिन्हें ज़माना बना गया।